*अनूपपुर पर दोहरा हमला फैक्ट्री का ज़हर और पानी की लूट तीसरा थर्मल पावर प्लांट बनेगा प्रदूषण की फैक्ट्री और प्यास का कारखाना?*अनूपपुर।जिला पहले ही हवा के ज़हर और पानी की कमी से जूझ रहा है, और अब तीसरे थर्मल पावर प्लांट की तैयारी ने हालात को खतरे की आख़िरी सीमा तक पहुँचा दिया है।यह सिर्फ एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि अनूपपुर के लिए प्रदूषण और जल-संकट का विस्फोटक पैकेज बनती जा रही है।आज सवाल सीधा है—क्या अनूपपुर को बिजली चाहिए या ज़िंदा रहने की गारंटी?फैक्ट्री का धुआं: सांसों पर सीधा हमलापहले से चल रहे दो थर्मल पावर प्लांटों के बीच अब तीसरा प्लांट जुड़ने का मतलब—अनूपपुर की हवा में तीन गुना ज़्यादा राख, सल्फर डाइऑक्साइड और जहरीले कण।स्थानीय लोगों का कहना है कि—बच्चों में दमा, एलर्जी और लगातार खांसी बढ़ चुकी हैबुजुर्गों में सांस फूलना, सीने में जलन आम हो गई हैआंखों में जलन और त्वचा रोग बढ़ रहे हैंपर्यावरण जानकार चेताते हैं—अगर तीनों प्लांट पूरी क्षमता पर चले, तो अनूपपुर का AQIखतरनाक श्रेणी में पहुंच सकता है।मतलब साफ—यह फैक्ट्री बिजली नहीं, बीमारी की सप्लाई करेगी।राख और रसायन: ज़मीन को कब्रिस्तान बनाने की तैयारीथर्मल प्लांटों से निकलने वाली फ्लाई ऐश और रासायनिक अपशिष्टसिर्फ हवा नहीं, मिट्टी और फसलों को भी जहरीला बना रहे हैं।ग्रामीणों के आरोप हैं—खेतों की उपज लगातार घटती जा रही हैपशुओं में असामान्य बीमारियां बढ़ रही हैंकई इलाकों में मिट्टी की उर्वरता खत्म होने लगी हैयह विकास नहीं—धीरे-धीरे पूरे इलाके को बंजर बनाने की योजना लगती है।पानी पहले ही कम, अब फैक्ट्री पी जाएगी बची-खुची बूंदेंअनूपपुर जिला पहले से ही भीषण जल-संकट से जूझ रहा है।गर्मियों में कई गांवों मेंहैंडपंप सूख जाते हैंटैंकरों से पानी लाना पड़ता हैमहिलाएं-बच्चे किलोमीटरों दूर से पानी ढोते हैंऐसे में तीसरा थर्मल पावर प्लांट मतलब—लाखों लीटर पानी रोज़ाना मशीनों को सौंपना।अब सवाल यह है—जब लोगों को पीने का पानी मुश्किल से मिल रहा है,तो क्या वही पानी फैक्ट्री की भट्टियों में झोंक दिया जाएगा?सोन नदी पर सीधा डाकातीसरे प्लांट के साथ सोन नदी से और अधिक पानी उठाया जाएगा।साथ ही गर्म और रासायनयुक्त पानी वापस नदी में छोड़े जाने की आशंका है।ग्रामीणों की चेतावनी साफ है—“आज नदी का पानी फैक्ट्री पी जाएगी, कल हमारे बच्चों को एक बूंद नहीं मिलेगी।”अगर सोन नदी कमजोर पड़ी—तो अनूपपुर कीखेतीपशुपालनऔर ग्रामीण अर्थव्यवस्थातीनों धराशायी हो जाएंगे।प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रशासन पर बड़ा सवालअब गुस्सा सीधे सिस्टम पर है—प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नेक्या असल ज़मीनी हालात की रिपोर्ट बनाई?क्या फैक्ट्री के उत्सर्जन और जल-उपयोग कास्वतंत्र वैज्ञानिक आकलन हुआ?क्या कलेक्टर कार्यालय ने यह तय किया किपानी इंसानों को मिलेगा या मशीनों को?अगर इन सवालों का जवाब नहीं है,तो यह साफ है—अनूपपुर में नियम नहीं, रियायतें चल रही हैं।जनता का ऐलान: अब फैक्ट्री का ज़हर नहीं सहेंगेसामाजिक संगठनों और ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि वे—परियोजना पर तत्काल रोकनई जनसुनवाईस्वास्थ्य प्रभाव अध्ययनजल-स्रोत सुरक्षा योजनाकी मांग को लेकर राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपेंगे।अंतिम सवाल—जो हर गली में गूंज रहा हैअगर विकास का मतलब है—जहरीली हवा, सूखती नदियां और बीमार बच्चे,तो फिर ऐसे विकास की जरूरत किसे है?आज अनूपपुर पूछ रहा है—“हमें फैक्ट्री नहीं चाहिए, हमें सांस और पानी चाहिए।”अब फैसला प्रशासन को करना है—या तो वह जनता के साथ खड़ा होगा,या इतिहास में उन अफसरों की सूची में जाएगाजिन्होंने प्रदूषण और प्यास के सामने आंखें मूंद लीं।




