जंगल में जन्म, फैक्ट्री में अंत — क्या यही संदेश देने आई थी दक्षिण वन मंडल शहडोल की कार्यशाला?

शहडोल | विशेष रिपोर्ट
ओरिएंट पेपर मिल क्षेत्र में आयोजित कूप विदोहन कार्यशाला केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि उसने पूरे वन तंत्र और उसकी सोच पर सवाल खड़े कर दिए। जिस पौधे को बड़ा होने में 5 से 10 वर्ष लगते हैं—जो ऑक्सीजन देता है, पर्यावरण को संतुलित करता है—उसी पौधे की यात्रा को जंगल से फैक्ट्री तक दिखाकर कार्यशाला समाप्त कर दी गई।वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ आयोजन यह कार्यशाला दक्षिण शहडोल वनमंडल द्वारा आयोजित की गई, जिसमें वन विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी स्वयं उपस्थित रहे—
श्री अनुपम सहाय (भा.व.से.) – वन संरक्षक, वन वृत्त शहडोल
सुश्री श्रद्धा पेंद्रो (भा.व.से.) – वनमंडलाधिकारी, दक्षिण शहडोल श्री रामनरेश विश्वकर्मा – वन परिक्षेत्राधिकारी, शहडोल
सुश्री भाग्यशाली सिंह – वन परिक्षेत्राधिकारी, खनौधी
श्री अंकुर तिवारी – वन परिक्षेत्राधिकारी, केशवाही
श्री सलीम खान – वन परिक्षेत्राधिकारी, बुढ़ार
साथ ही कूप प्रभारी, सहायक कूप प्रभारी एवं विभागीय अमला भी मौजूद रहा।
💔 सवाल यह नहीं कि कौन आया, सवाल यह है कि संदेश क्या गया इतने वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति के बावजूद जनता के मन में यह प्रश्न गूंज रहा है कि— यदि उद्देश्य वन संरक्षण और हरियाली को बढ़ावा देना था,तो कार्यशाला का मंच फैक्ट्री क्षेत्र क्यों बना?
क्यों यह संदेश गया कि— पौधे का जन्म जंगल में होता है,और उसका अंत फैक्ट्री में तय है। जनता की अपेक्षा संरक्षण का जीवंत संदेश
क्षेत्रवासियों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि—
“ऐसी कार्यशालाएँ उन स्थानों पर होनी चाहिए
जहाँ जीवन पनपता हो,
जहाँ नई कोंपलें उगती हों,
ताकि यह भरोसा बने कि जंगल सिर्फ उद्योग का कच्चा माल नहीं है।यह खबर है,बल्कि एक सामूहिक सोच पर उठाया गया प्रश्न है। जब इतने वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हों,तो जनता को यह भरोसा भी मिलना चाहिए कि कार्यशाला का संदेश जीवन के पक्ष में है, न कि उसके अंत के पक्ष में। अंतिम प्रश्न आज भी कायम जिस पेड़ को बड़ा होने में एक दशक लगता है,
क्या उसका भविष्य केवल फैक्ट्री तक सीमित रह गया है?
जंगल में जन्म और फैक्ट्री में अंत—तो यह कार्यशाला आखिर किसके लिए थी?


