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सुलगते सवाल: सत्ता का मद या जनता की प्यास? मंत्री दिलीप जायसवाल के बिगड़े बोलों से बढ़ा विवाद।

सुलगते सवाल: सत्ता का मद या जनता की प्यास? मंत्री दिलीप जायसवाल के बिगड़े बोलों से बढ़ा विवाद।

अनूपपुर।
नगरपालिका परिषद बिजुरी में दूषित पेयजल की समस्या अब केवल स्थानीय असुविधा नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बहस का मुद्दा बन चुकी है। काला पानी सप्लाई होने की शिकायतों के बीच जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी पर सवाल उठ रहे हैं। इसी दौरान राज्य मंत्री दिलीप जायसवाल की पत्रकारों के प्रति कथित अमर्यादित टिप्पणी ने मामले को और तूल दे दिया है।
जनता जहां पीने के साफ पानी की मांग कर रही है, वहीं इस मुद्दे पर दिए गए मंत्री के बयान को लेकर जनमानस और मीडिया जगत में नाराज़गी देखी जा रही है।

नल से निकलता पानी: राहत या बीमारी का खतरा?

नगरवासियों का आरोप है कि बिजुरी में फिल्टर प्लांट और टैंकरों के माध्यम से जो पानी सप्लाई किया जा रहा है, वह साफ पेयजल की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा। कई वार्डों में गंदे, बदरंग पानी की शिकायतें सामने आई हैं।

स्थानीय लोगों के अनुसार:-

अनेक बोरवेल वर्षों से महज कुछ समय तक ही सुचारू रूप से पानी देकर बंद पड़ जाते हैं, जबकी लोग पूरी तरह नगरपालिका सप्लाई पर निर्भर हैं।
पानी की गुणवत्ता को लेकर नियमित जांच और पारदर्शिता का अभाव है।
कुछ नागरिकों ने पेट और त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ने की आशंका जताई है, हालांकि स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस पर कोई आधिकारिक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है।

मंत्री का बयान बना विवाद की वजह-

जब इस विषय पर मंत्री दिलीप जायसवाल से सवाल किया गया, तो उनके बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया। उपस्थित पत्रकारों के अनुसार, मंत्री ने कथित रूप से यह टिप्पणी की कि यह पानी बर्तन धोने या सब्जी-भाजी सींचने के उपयोग का है।
यह बयान सामने आने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या जनता को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं है? यदि पानी पीने योग्य नहीं है, तो वैकल्पिक व्यवस्था क्या है — इस पर स्पष्टता अब तक नहीं मिल पाई है।

पत्रकारों से तीखा व्यवहार, बढ़ी नाराज़गी-

मामले को लेकर स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि सवाल पूछने पर मंत्री का रवैया असहज और आक्रामक था। इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद की स्वस्थ परंपरा के विपरीत बताया जा रहा है।
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है, और जनसमस्याओं को सामने लाना उसकी जिम्मेदारी है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों की ओर से संयमित और जवाबदेह व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।

सत्ता पर उठते बड़े सवाल-

बिजुरी में पेयजल संकट और मंत्री के बयान के बाद अब कई बुनियादी प्रश्न चर्चा में हैं:
क्या क्षेत्र में पेयजल गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी?
यदि पानी पीने योग्य नहीं, तो सुरक्षित पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था कब तक?
क्या जनप्रतिनिधियों द्वारा मीडिया के प्रति कथित असम्मानजनक व्यवहार पर कोई स्पष्टीकरण आएगा?
दशकों से एक ही राजनीतिक दल के प्रतिनिधित्व के बावजूद बुनियादी सुविधाओं का अभाव क्या प्रशासनिक विफलता नहीं दर्शाता?

जनता की जरूरत बनाम राजनीतिक बयानबाज़ी-

बिजुरी जैसे कोयलांचल क्षेत्र में, जहां बड़ी आबादी नगरपालिका सप्लाई पर निर्भर है, वहां पानी केवल सुविधा नहीं, जीवन का प्रश्न है। राजनीतिक बयानबाज़ी से इतर, लोग ठोस समाधान चाहते हैं — साफ पानी, पारदर्शी व्यवस्था और जवाबदेही।
सत्ता बदलती रहती है, लेकिन पानी, स्वास्थ्य और सम्मानजनक संवाद जैसे मुद्दे स्थायी हैं। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि प्रशासन इस विवाद को केवल बयान तक सीमित रखता है या जमीनी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाता है।

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