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डूमरकछार नगर परिषद में संविलियन प्रक्रिया पर गंभीर आपत्तियां, विधिक परीक्षण की मांग

डूमरकछार नगर परिषद में संविलियन प्रक्रिया पर गंभीर आपत्तियां, विधिक परीक्षण की मांग
राजनगर/अनूपपुर। नवगठित नगर परिषद डूमरकछार में वर्ष 2021 में संपन्न संविलियन प्रक्रिया को लेकर वैधानिकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाए गए हैं। निकाय अध्यक्ष एवं अन्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत अभ्यावेदनों में आरोप लगाया है कि संविलियन आदेश न केवल सेवा नियमों के विपरीत है, बल्कि नियुक्ति शर्तों के उल्लंघन के बावजूद उसे प्रभावी बनाए रखा गया है।
नियुक्ति आदेश की शर्तों का कथित उल्लंघन
दस्तावेजों के अनुसार, 06 फरवरी 2021 को जिला चयन समिति द्वारा पंचायतकालीन कर्मचारियों का संविलियन म.प्र. नगर पालिका सेवा (वेतन एवं भत्ता) नियम, 1967 के नियम 8 के अधीन किया गया था। संबंधित कर्मचारी को राजस्व उपनिरीक्षक पद पर तीन वर्ष की परिवीक्षा अवधि के लिए पदस्थ किया गया, जिसमें एलएसजीडी डिप्लोमा प्राप्त करना अनिवार्य शर्त के रूप में उल्लेखित था।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि परिवीक्षा अवधि पूर्ण होने के उपरांत भी उक्त अनिवार्य अर्हता अर्जित नहीं की गई, तथापि सेवा शर्तों के अनुरूप मूल पद पर पुनः पदस्थापना की कार्यवाही नहीं की गई। इसे नियुक्ति आदेश की स्पष्ट शर्तों का उल्लंघन बताया जा रहा है।
संविलियन की वैधानिकता पर प्रश्न
पंचायत राज संचालनालय, मध्य प्रदेश द्वारा 28 जून 2017 को जारी पत्र का हवाला देते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि ग्राम पंचायत सचिव का नगरीय निकाय में संविलियन अनुमन्य नहीं है। ऐसे में संविलियन आदेश को प्रारंभ से ही विधि-विरुद्ध (void ab initio) घोषित किए जाने की मांग उठाई गई है।
वित्तीय अनियमितताओं के आरोप
अभ्यावेदन में यह भी आरोप है कि निकाय गठन के उपरांत कथित रूप से फर्जी प्रस्तावों, अभिलेखीय हेरफेर तथा नगर पालिका अधिनियम एवं लेखा वित्त नियमों के उल्लंघन के माध्यम से शासकीय धनराशि का दुरुपयोग किया गया। शिकायतकर्ताओं ने इसे वित्तीय अनुशासन एवं लोकनिधि संरक्षण के सिद्धांतों के प्रतिकूल बताया है तथा स्वतंत्र लेखा-परीक्षण (independent audit) की मांग की है।
न्यायालयीन आदेशों की व्याख्या पर आपत्ति
कुछ जनप्रतिनिधियों ने यह भी आरोप लगाया है कि माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की चयनात्मक या त्रुटिपूर्ण व्याख्या कर प्रशासनिक निर्णयों को औचित्य प्रदान किया जा रहा है। उनका कहना है कि न्यायालयीन आदेशों का आशय नियमों की अवहेलना नहीं हो सकता, और यदि किसी आदेश का अनुपालन किया गया है तो उसकी विधिक सीमाओं का परीक्षण आवश्यक है।
निष्पक्ष जांच और दायित्व निर्धारण की मांग
जनप्रतिनिधियों ने संपूर्ण प्रकरण की समयबद्ध, निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कर—
संविलियन आदेश की वैधानिक समीक्षा,
परिवीक्षा शर्तों के पालन का परीक्षण,
वित्तीय लेन-देन की लेखा-परीक्षा,

तथा दोषसिद्धि की स्थिति में विभागीय एवं दंडात्मक कार्यवाही
सुनिश्चित किए जाने की मांग की है।
मामले में संबंधित अधिकारियों का पक्ष अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। प्रशासनिक प्रतिक्रिया एवं जांच की प्रगति के बाद ही प्रकरण की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी

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